Pratiharya Vandana प्रातिहार्य वंदना
भ्रमर तणां गुंजन अने चर पांदड़े नाची रह्यो
तुज गुणथी जे रक्तवर्णी शोभने पामी रह्यो
जे शोकने दूरे करे अद्भुत सुखने वळी लहे
ते चैत्यवृक्ष अशोक प्रातिहार्यने करुं वंदना।
छए दिशामां विस्तरी शाखाओ अथड़ाय छे।
ते तालमां मगन थई उमंगथी नचाय छे।
रक्षा करे छे जीवनी कहेतो अशोक सदाय रे।
प्रथम प्रातिहार्यने भावे करुं हुं वंदना…. १
सुंदर सुगंधी फूलडांने देवमळी વરસवता,
ढींचण सुधी पंचवर्णना योजन भूमिमां राजता,
सहु भाविको उपर चाले पण पुष्पने न किलामणा,
एवा पुष्पवृष्टि प्रातिहार्यने भावथी करुं वंदना।
मधमध सुगंधी कल्पवृक्ष आदि बहु फूलडां
पांचे इंद्रियने जीतवा વરસावे पंच वर्णना,
खुशी थता जय बोलता देवो, देशना भूमिमां
द्वितीय प्रातिहार्यने भावे करुं हुं वंदना… २
जेना सुधा रस दिव्यध्वनिने सांभळीने दौड़ता
मृगलादि तिर्यंचो सहु निज जाति वैरने ओकता,
साकर द्राक्षतणी मिठासने भाविको सहु भूलता,
एवा दिव्य ध्वनि प्रातिहार्यने भावथी करुं वंदना।
दानादि चारे धर्मनी चारे मुखेथी देशना,
गंभीर नादे गूंजती मीठी मधुरी देशना,
दूर करे चारे कषाय केरी दुष्ट वासना,
तृतीय प्रातिहार्यने भावे करुं हुं वंदना… ३
हंसलानी श्रेणिसम जे चामरोने ढाळता,
सौधर्मने ईशान इन्द्रो निशदिन तत्पर थता,
चामर टाळे कर्मरजने नम्र भाव प्रगट करे,
एवा चामर प्रातिहार्यने भावथी करुं वंदना।
जीती गया छो राग वळी द्वेष शत्रुने विभो,
विजयपत्रक वरी गया छो, पूर्णचंद्र छो प्रभु,
शोभी रह्या चामरो ढळाई रह्या तुम विभो,
चतुर्थ प्रातिहार्यने भावथी करुं वंदना… ४
रत्ने जया कनके घडया सोना सिंहासन उपरे,
चारे दिशानी पर्षदाने देशना तुम सुखकरे,
अमृत झरती वाणी सुणतां सर्वजीव निर्भय बने।
एवा सिंहासन प्रातिहार्यने भावथी करुं वंदना।
मोह-मस्त हस्तिने हरावनारा छो तमे,
पुरुषसिंह नामने धरावनारा छो तमे,
देवे रच्या सिंहासने बिराजमान छो तमे,
पंचम प्रातिहार्यने भावथी करुं वंदना… ५
जिम चांदनीथी परिवरેલો चंद्र चकोरने कहे,
वली कमलवन विकसित करे जे सूर्यदीपे बहु परे,
झळझळ थतुं भामंडळुं अज्ञान तिमिरने हरे,
एवा भामंडल प्रातिहार्यने भावथी करुं वंदना।
सात भय केरडां ईंधणना दहनमां अग्नि समान,
तेजने धारण करे भामंडळां तुज संगथी,
जाणे शीतल प्रकाश केरा मंडळा,
षष्ठम प्रातिहार्यने भावथी करुं वंदना… ६
जागो उठो रे भव्य जीवो, निद्राने दूरे करो,
प्रमाद रूप पिशाचने दूरे करी सार ने वरो,
आ दुंदुभि प्रभुनी कहे क्षण क्षण रहो प्रभु ध्यानमां,
एवा दुंदुभि प्रातिहार्यने भावथी करुं वंदना।
आठे दिशामां गाजतो सहुना मदने मोडतो,
आठ कर्मरूप अरि हार ने जणावतां,
आ दुंदुभिनो नाद घणो गगन मांहे गाजतो,
सप्तम प्रातिहार्यने भावथी करुं वंदना… ७
स्वर्ग मृत्यु पातालना अरिहंत एक ज नाथ छे।
मन वचन कायरूप जीव अनाथना वळी नाथ छे,
जे चक्रवर्ती सुरासुरना एक छत्री शिवसाथ छे,
एवा छत्रत्रयी प्रातिहार्यने भावथी करुं वंदना।
ज्ञान दर्शन चरण तणी साधी तमे साधना,
रत्नत्रयी राज्यमा स्वनी करी उपासना,
मुक्ताफळ माळनी छत्रत्रयीनी सोहना,
अष्टम प्रातिहार्यने भावथी करुं वंदना… ८
Pratiharya Vandana
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