Arihant Vandanawali अरिहंत वंदनावली
मंदिर छो मुक्तितणा, मांगल्य क्रीडाना प्रभु,
ने इन्द्र नर ने देवना, सेवा करे तारी विभु,
सर्वज्ञ छो स्वामी वळी, शिरदार अतिशय सर्वना
घणुं जीव तुं घणुं जीव तुं, भंडार ज्ञानकळा तणा. १
त्रण जगतना आधार ने, अवतार हे करुणा तणा,
वळी वैद्य हे दुर्वार आ, संसारनां दुःखो तणा,
वीतराग वल्लभ विश्वना, तुज पास अर्जि उच्चरुं
जाणो छतां पण कही अने आ हृदय हुं खाली करुं. २
शुं बालको मा-बाप पासे, बालक्रीडा नव करे ?
ने मुखमांथी जेमआवे तेमशुं नव उच्चरे ?
तेमज तमारी पास तारक, आज भोळा भावथी,
जेवुं बन्युं तेवुं कह्युं, तेमां कशुं खोटुं नथी. ३
में दान तो दीधुं नहि ने शीयळ पण पाळ्युं नहि,
तपथी दमी काया नहि, शुभ भाव पण भाव्यो नहि,
ए चार भेदे धर्ममांथी कांईपण प्रभु नव कर्युं,
मारुं भ्रमण भव सागरे निष्फळ गयुं निष्फळ गयुं. ४
हुं क्रोध अग्निथी बळ्यो वळी लोभ सर्प डस्यो मने,
गळ्यो मानरूपी अजगरे हुं केमकरी ध्यावुं तने ?
मन मारुं मायाजाळमां मोहन ! महा मुंझाय छे,
चडी चार चोरो हाथमां, चेतन घणो चगदाय छे. ५
में परभवे के आ भवे पण, हित कांई कर्युं नहि, |
तेथी करी संसारमां, अल्प पण सुख पाम्यो नहि,
जन्मो अमारा जिनजी ! पूर्ण करवाने थया
आवेल बाजी हाथमां, अज्ञानथी हारी गया. ६
अमृत झरे तुज मुखरूपी, चन्द्रथी तो पण प्रभु,
भिंजाय नहि मुज मन अरेरे ! शुं करुं हुं तो विभु?
पत्थर थकी पण कठण मारुं, मन खरे क्यांथी द्रवे ?
मरकट समा आ मन थकी, हुं तो प्रभु हार्यो हवे. ७
भमतां महा भवसागरे पाम्यो पसाये आपना,
जे ज्ञान दर्शन ने चरणरूपी रत्नत्रय दुष्कर घणां,
ते पण गया परमादना, वशथी प्रभु कहुं छुं खरुं,
कोनी कने किरतार आ पुकार हुं जइने करुं? ८
ठगवा विभु आ विश्वने, वैराग्यना रंगो धर्या,
ने धर्मना उपदेश रंजन, लोकने करवां कर्या,
विद्या भण्यो हुं वाद माटे, केटली कथनी कहुं?
साधु थईने बाहरथी, दांभिक अंदरथी रहुं. ९
में मुखने मेलुं कर्युं, दोषो पराया गाईने,
ने नेत्रने निंदित कर्या, परनारीमां लपटाईने,
वळी चित्तने दोषित कर्युं, चिंती नठारुं परतणुं,
हे नाथ ! मारुं शुं थशे, चालाक थई चुक्यो घणुं. १०
करे काळजाने कतल पीडा, कामनी बिहामणी,
ए विषयमां बनी अंध हुं, विडंबना पाम्यो घणी,
ते पण प्रकाश्युं आज लावी, लाज आप तणी कने,
जाणो सहु तेथी कहुं, कर माफ मारा वांकने. ११
नवकार मंत्र विनाश कीधो, अन्य मंत्रो जाणिने,
कुशास्त्रनां वाक्यो वडे, हणी आगमोंनी वाणीने,
कुदेवनी संगतथी, कर्मो नकामा आचर्यां,
मतिभ्रमथकी रत्नो गुमावी, काच कटका में ग्रह्या. १२
आवेल दृष्टिमार्गमां, मूकी महावीर आपने,
में मूढधीए हृदयमां, ध्याया मदनना चापने,
नेत्रबाणो ने पयोधर, नाभि ने सुंदर कटी,
शणगार सुंदरीओ तणा, छटोल थई जॊया अति. १३
मृगनयणी समनारीतणा, मुखचंद्र निरखवा वळी,
मुज मन विषे जे रंग लाग्यो, अल्प पण गाढो अति,
तें श्रुतरूप समुद्रमां, धोया छतां जातो नथी,
तेनुं कहो कारण तमे, बचुं केमहुं आ पापथी ? १४
सुंदर नथी आ शरीर के, समुदाय गुण तणो नथी,
उत्तमविलास कळा तणो, देदीप्यमान प्रभा नथी,
प्रभुता नथी तो पण प्रभु!, अभिमानथी अक्कड फरुं,
चोपाट चार गति तणी, संसारमां खेल्या करुं. १५
आयुष्य घटतुं जाय तो पण, पापू बुद्धि नव घटे,
आशा जीवननी जाय पण, विषयाभिलाषा नव मटे,
औषध विषे करुं यत्न पण हुं, धर्मने तो नव गणुं,
बनी मोहमा मस्तान हुं, पाया विनाना घर चणुं. १६
आत्मा नथी परभव नथी, वळी पुण्य पापू कशुं नथी,
मिथ्यात्वीनी कटु वाणी में धरी, कान पीधी स्वादथी,
रवि समहता ज्ञाने करी प्रभु, आपथी तो पण अरे,
दीवो लई कूवे पड्यो धिक्कार छे मुजने खरे. १७
में चित्तथी नहि देवनी के, पात्रनी पूजा चही ,
ने श्रावको के साधुओनो, धर्म पण पाळ्या नहि,
पाम्या प्रभु नरभव छतां, रणमां रड्या जेवुं थयुं,
धोबीतणा कुत्ता समुं मम, जीवन सहु एळे गर्युं. १८
हुं कामधेनु कल्पतरु, चिंतामणिना प्यारमां,
खोटा छतां झंख्यो घणुं, बनी लुब्ध आ संसारमां,
जे प्रगटसुख देनार ताहरो, धर्म ते सेव्यो नहि,
मुज मूर्ख भावोने निहाळी, नाथ कर करुणा कईं. १९
में भोग सारा चिंतव्या ते, रोग समचिंत्या नहि,
आगमन इच्छ्युं धन तणुं पण, मृत्युनॆ प्रीछ्युं नहि,
नहि चिंतव्युं में नरक, कारागृह समी छे नारीओ,
मधुबिंदुनी आशा महीं, भयमात्र हुं भूली गयो. २०
हुं शुद्ध आचारो वडे, साधु हृदयमां नव रह्यो,
करी कामपर उपकारनां, यश पण उपार्जन नव कर्यो,
वळी तीर्थना उद्धार आदि, कोई कार्यो नव कर्यां.
फोगट अरे! आ लक्ष चोराशी तणा फेरा फर्या. २१
गुरुवाणीमां वैराग्य केरो, रंग लाग्यो नहि मने,
दुर्जन तणां वाक्यो महीं, शांति मले क्यांथी मने,
तरुं केमहुं संसार आ, अध्यात्मतो छे नहि जरी
टूटेल तळियानो घडो, जळथी भराये केमकरी? २२
में परभवे नथी पुण्य कीधुं, ने नथी करतो हजी,
तो आवता भवमां कहो, क्यांथी थशे हे नाथजी?
भूत भावि ने – सांप्रत त्रणे, भव नाथ हुं हारी गयो,
स्वामी त्रिशंकु जेमहुं, आकाशमां लटकी रह्यो. २३
अथवा नकामुं आप पासे, नाथ शुं बकवुं घणुं ?
हे देवतानां पूज्य ! ! आ, चारित्र मुज पोतातणुं,
जाणो स्वरूप त्रण लोकनुं तो, माहरुं शुं मात्र आ
जयां क्रोडनो हिसाब नहि त्यां, पाईनी तो वात क्यां ? २४
ताराथी न समर्थ अन्य दीननो, उद्धारनारो प्रभु ! !
माराथी नहि अन्य पात्र जगमां, जोतां जडे हे विभु,
मुक्ति मंगल स्थान तोय मुजने, इच्छा न लक्ष्मी तणी,
आपो सम्यगरत्न श्यामजीवने, तो तृप्ति थाये घणी. ૨૫
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