Jag Jiwan Jagvalaho Jain Stavan जगजीवन जगवालहो…
जगजीवन जगवालहो…
जगजीवन जगवालहो, मरुदेवीनो नंद लाल रे;
मुख दीठे सुख उपजे, दरिशन अतिहि आनंद लाल रे. ।।१।।
आंखडी अम्बुज पांखडी, अष्टमी शशि सम भाल लाल रे;
वदन ते शारद चंदलो, वाणी अतिहि रसाल लाल रे. ।।२।।
लक्षण अंगे विराजतां, अडहिय सहस उदार लाल रे;
रेखा कर-चरणादिके, अभ्यंतर नहि पार लाल रे. ।।३।।
इन्द्र चन्द्र रवि गिरि तणां, गुण लही घडीयुं अंग लाल रे;
भाग्य किहां थकी आवीयुं, अचरिज एह उत्तंग लाल रे. ।।४।।
गुण सघळा अंगीकर्यां, दूर कर्या सवि दोष लाल रे;
वाचक ‘जशविजये’ थुण्यो, देजो सुखनो पोष लाल रे. ।।५।।
जैन स्तोत्र और वंदना
पंचषष्टियन्त्रगर्भित श्री चतुर्विंशतिजिनस्तोत्रम्
