No . 53 Ajit Jindanshu Preetdi अजित जिणंदशुं प्रीतडी… जैन स्तवन

Ajit Jindanshu Preetdi.अजित जिणंदशुं प्रीतडी…

 (राग : ऋषभ जिणेश्वर प्रीतम. परमातम पूरणकला. एक पंखी.)

अजित जिणंदशुं प्रीतडी, मुज न गमे हो बीजानो संग के;

मालती फुले मोहियो, किम बेसे हो बावळ तरु भृंग के. ॥१॥

गंगा जलमां जे रम्या, किम छिल्लर हो रति पामे मराल के; 

सरोवर जलधर जल विना, नवि चाहे हो जग चातक बाल के. ॥२॥

कोकिल कल कुजित करे, पामी मंजरी हो पंजरी सहकार के; 

ओछां तरुवर नवि गमे, गिरुआशुं हो होये गुणनो प्यार के. ॥३॥

कमलिनी दिनकर कर ग्रहे, वळी कुमुदिनी हो धरे चंदशुं प्रीत के; 

गौरी गिरीश गिरिधर विना, नवि चाहे हो कमला निज चित्त के. ॥४॥

तिम प्रभुशुं मुज मन रम्युं, बीजाशुं हो नवि आवे दाय के; 

श्री नयविजय सुगुरु तणो, वाचक’ जस’ हो नित नित गुण गाय के ॥५॥

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