Ajit Jindanshu Preetdi.अजित जिणंदशुं प्रीतडी…
(राग : ऋषभ जिणेश्वर प्रीतम. परमातम पूरणकला. एक पंखी.)
अजित जिणंदशुं प्रीतडी, मुज न गमे हो बीजानो संग के;
मालती फुले मोहियो, किम बेसे हो बावळ तरु भृंग के. ॥१॥
गंगा जलमां जे रम्या, किम छिल्लर हो रति पामे मराल के;
सरोवर जलधर जल विना, नवि चाहे हो जग चातक बाल के. ॥२॥
कोकिल कल कुजित करे, पामी मंजरी हो पंजरी सहकार के;
ओछां तरुवर नवि गमे, गिरुआशुं हो होये गुणनो प्यार के. ॥३॥
कमलिनी दिनकर कर ग्रहे, वळी कुमुदिनी हो धरे चंदशुं प्रीत के;
गौरी गिरीश गिरिधर विना, नवि चाहे हो कमला निज चित्त के. ॥४॥
तिम प्रभुशुं मुज मन रम्युं, बीजाशुं हो नवि आवे दाय के;
श्री नयविजय सुगुरु तणो, वाचक’ जस’ हो नित नित गुण गाय के ॥५॥
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