।।Tijaypahut Stotra तिजयपहूत्त स्तोत्र।।
इस तिजयपहूत्त स्तोत्र (Tijaypahut Stotra) में विभिन्न संख्याओं के तीर्थकर समुहों का स्मरण करते हुए यह प्रार्थना की जाती है, कि वे सच्चे भक्तों के समस्त पाप कर्मों को नष्ट कर दें।स्तोत्र के पद्यों में तीर्थकरों से यह प्रार्थना की जाती है कि वे गृह दोष, भूत-पिशाच, भयानक बीमारी (ज्वर), आग, जल, सिंह, हाथी, चोर और शत्रुओं से उत्पन्न घोर भय को दूर करें।
अंत में, देवों और असुरो द्वारा पूजित सिद्धस्वरूप तीर्थकरों से साधक के शरीर की रक्षा करने और ‘सर्वतोभद्र” नामक यंत्र के माध्यम से जीवन में शांति, रिद्धि-सिद्धि और कल्याण की कामना की जाती है।
तिजय-पहुत्त-पयासय, अट्ठ-महापाडिहेर-जुत्ताणं।
समयक्खित्त-ठिआणं, सरेमिचक्कं-जिणिदाणं।।1।।
पणवीसा य असीआ, पनरस पन्नास जिणवर समूहो।
नासेउ सयल-दुरिअं, भविआणं भत्ति-जुत्ताणं।।2।।
वीसा पणयाला विय, तीसा पन्नत्तरी जिणवरिंदा।
गहभूअरक्खसाइणी-घोरुवसग्गं पणासंतु।।3।।
सत्तरि पणतीसा वि य, सटठी पंचेव जिणगणो एसो।
वाहिजलजलणहरिकरि- चोरारिमहाभयं हरउ।।4।।
पणपन्ना य दसेव य, पन्नटठी तह य चेव चालीसा ।
रक्खंत् में सरीरं, देवासूर-पणमिया सिद्धा।।5।।
ऊँ हरहुंहः सरसुंसः, हरहुंह: तह य चेव सरसुसः।
आलिहियनामगबभं, चक्कं किर सव्वओभद्दं।।6।।
ऊँ रोहिणी पन्नत्ती, वज्जसिंखला तह य वज्जअंकुसिया।
चक्केसरी नरदत्ता, कालि महाकालि तह गोरी।।7।।
गंधारी महाज्वालः,माणवि वइरुट्ट तहय अच्छुत्ता।
माणसि महमाणसिआ. विज्जादेवीओ रक्खंतू ।।8।।
पंचदसकम्मभूमिसु, उप्पन्नं सत्तरी जिणाण सय
विविहरयणाइवन्नो-वसोहिअं हरउ दरिआइं।।9।।
चउतीस अइसयजुआ, अटठमहापाडिहेरकयसोहा।
तित्थयरा गयमोहा, झाएअव्वा पयत्तेणं।।10।।
ऊँ वरकणयसंखविद्दुम, मरगयघणसंनिहं विगयमोहं।
सत्तरिसयं जिणाणं, सव्वामरपूड्अं वंदे स्वाहा।।11।।
ऊँ भवणवईवाणवंतर-जोइसवासी विमाणवासी अ।
जे के वि दुट्ठदेवा, ते सव्वे उवसमंतु मम स्वाहा ।।12।।
चंदणकप्पुरेणं, फलए लिहिउण खालिअं पीअं।
एगतराइगहभूअ-साइणीमुग्गं पणासेई ।।13।।
इअ सत्तरिसयं जंतं, सम्मं मंतं दुवारिपडिलिहिअं।
दूरिआरिविजयवंतं. निबभंतं निच्चमच्चेह।।14।।
।।Tijaypahut Stotra तिजयपहूत्त स्तोत्र।।
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