No. 47 Jayatihuan Stotra जयतिहुअण स्तोत्र

Jayatihuan Stotra जयतिहुअण स्तोत्र

जयतिहुअण-वरकप्परुक्ख !, जय जिण ! धन्नंतरि!, जयतिहुअण-कल्लाणकोस ! दुरिअक्करिकेसरि !;

तिहुअणजण-अविलंघिआण! भुवणत्तय-सामिय!, कुणसु सुहाइं जिणेस! पास ! थंभणयपुरट्ट्ठिअ ! १

तह समरंत लहंति झत्ति वरपुत्तकलत्तइ, धण्णसुवण्णहिरण्णपुण्ण जण भुंजइ रज्जइ;

पिक्खइ मुक्ख असंखसुक्खं तुह पास ! पसाइण!, इअ तिहुअण-वरकप्परुक्ख ! सुक्खइ कुण महजिण ! …. २

जरजज्जर परिजुण्ण-कण्ण नटुट्ठ सुकु-ट्ठिण. चक्खु-क्खीणखएणखुण्ण नर सल्लिय सूलिण;

तुह जिण ! सरणरसायणेण लहुहुंति पुणण्णव, जय धन्नंतरि ! पास ! महवि तुह रोगहरो भव ३

विज्जा जोइस मंत तंत सिद्धिउ अपयत्तिण, भुवणऽब्भुउ अठ्ठविह सिद्धि सिज्झहि तुह नामिण;

तुह नामिण अपवित्तओवि जणहोइ पवित्तउ, तं तिहुअणकल्लाणकोस ! तुह पास ! निरुत्तउ ४

खुद्दपउत्तइ मंत तंत जंताइ विसुत्तइ, चर-थिर-गरल-गहुग्ग-खग्ग-रिउवग्ग विगंजइ;

दुत्थियसत्थ अणत्थघत्थ नित्थारइ-दय करि, दुरियइ हरउ सपासदेउ ! दुरियक्करि केसरि !५

तुह-आणा थंभेइ भीम दप्पुध्धुरसुरवर-, रक्खस जक्खफणिंदविंद चोराऽनल जलहर;

जलथरचारि रउद्दखुद्दपसुजोइणिजोइय, इय तिहुअण-अविलंघिआण जयपास ! सुसामि ! य…….६

पत्थिय-अत्थ-अणत्थतत्थ भत्तिब्भर निब्भर, रोमं चंचिय-चारु कायकिन्नर-नर-सुरवर; ज

सु सेवहि कमल-मलजुयल पक्खालिय कलिमलु, सो भुवणत्तय-सामी पासमह-मद्दउ रिउबलु ७

जयजोइय-मणकमल-भसल ! भय पंजरकुंजर!, तिहुअणजण आणंदचंद भुवणत्तय-दिणयर !;

जयमइ-मेइणि-वारिवाह! जयजंतु पियामह!, थंभणयट्ठिय! पासनाह नाहत्तण कुणमह

बहुविह वन्नु अवन्नु सुन्नु वन्निउ छप्पन्निहि, मुक्खधम्म-कामत्थकाम नर नियनिय सत्थिहि;

जं ज्झायहि बहुदरिसणत्थ बहुनामपसिद्धउ, सो जोइयमणकमल-भसलसुहुपास पवद्धउ

भयविब्भल-रणजणिरदसण थरहरिय-सरीरय, तरलिय-नयण विसुन्न गग्गारगिर करुणय,

तइ सहसत्ति-सरंत हुंतिनर नासियगुरुदर, मह विज्झविसिज्झसइ पास ! भयपंजरकुंजर !

पइं पासिवि वियसं तनित्तपत्तं तपवित्तिय, -बाहवाहपवूढ रूढ दुहदाह सुपुलइयः मन्नइ

मन्नु सउन्नुपुन्नु अप्पाणं सुरनर, इय तिहुअण-आणंदचंद ! जय पास !, जिणेसर ! ……… ११

तुह कल्लाण-महेसु घंटटंकारव-पेल्लिय वल्लि रमल्ल महल्लभत्ति सुरवर गुंजुल्लिय;

हलप्फलिय पवत्तयंति भुवणेवि महूसव, इय तिहुअण-आणंदचंद ! जय पास ! सुहुब्भव !

निम्मल केवल किरणनियर-विहुरिय-तमपहयर ! दंसिय-सयलपयत्थ सत्थ ! वित्थरिय-पहाभर !;

कलिकलुसिय जणधूय लोयलोयणह अगोयर !, तिमिरइ निरुहर पास! नाह! भुवणत्तय-दिणयर ! .१३

तुह समरण-जलवरिस-सित्तमाणव-मइमेइणि, अवरावर-सुहुमत्थ-बोहकंदलदल रेहणि

जाइय फलभर भरिय हरिय दुहदाह अणोवम, इय मइमेइणि-वारिवाह दिस पास मइंमम

कयअविकल-कल्लाण वल्लि उल्लुरिय-दुहवणु, दावियसग्गऽपवग्गमग्ग दुग्गइ-गमवारणुः

जयजं तुह जणएण तुल्ल जं जणिय हियावहु, रम्मु धम्मु सो जयउ पास जयजंतुपियामहु

भुवणारण्ण-निवास दरिय परदरिसण देवय, जोइणि पूअण खित्तवाल खुद्दासुर पसुवय;

तुह उत्तट्ठ सुनट्ठ सुट्ट्टु अविसंठुलु चिट्ठहि, इयति हुअणवणसीह! पास पावाइ पणासहि

फणिफण-फारफुरंत रयण कररंजिय नहयल !, फलिणीकं दलदल-तमाल-नीलुप्पल-सामल !;

कमठासुर उवसग्ग-वग्गसंसग्ग-अगंजिय!, जय पच्चक्ख जिणेस! पास ! थंभणय-पुरट्ठिय !

महमणु तरलु पमाणु नेय वाया वि विसंठुलु, नेय तणुरवि अविणय-सहावु अलसविह-लंथलुः

तुह माहप्पु पमाणुदेव ! कारुण्ण-पवित्तउ, इय मइ मा अवहीरि पास! पालिहि विलवंतउ

किं किं कप्पिउ नयकलुणु किं किं वन जंपिउ, क्विन चिट्ठिउ किट्ट्ठदेव! दीणयमऽवलंबिउ;

कासु न किय निष्फल लल्लि अम्हेहि दुहत्तिहि, तहवि नपत्तउ ताणुकिंपि पइपहु! परिचत्तिहि .१९

तुहुसामिउ तुहुमाय बप्पु तुहुमित्त पियंकरु, तुहुगइ तुहु मइ तुहु जिताणु तुहु गुरु खेमंकरु;

हउं दुहभर-भारिउ वराउ राउल निब्भग्गह लीणउ, तुह कमल-मलसरणु जिण! पालहि चंगह

पइकिविक्य नीरोय लोय किवि पाविय-सुहसय, किवि मइमंत महंतकेवि किवि साहिय-सिवपय;

किवि गंजिय-रिउवग्ग केवि जसधवलिय-भूयल, मइ अवहीरहिकेण पास ! सरणागय-वच्छल !

पच्चुवयार-निरीह ! नाह! निप्पन्न-पओयण !, तुह जिणपास ! परोवयार-करणिक्क-परायण!;

सत्तुमित्त-समचित्त वित्ति ! नयनिंदय-सममण! मा अवहीरियऽजुग्गउवि मइपास निरंजण !.

हउ बहुविह-दुहतत्तगतु तुह दुहनासणपरु, हउ सुयणह करुणिक्कट्ठाणु तुहु निरु करुणायरु;

हउ जिणपास ! अ सामिसालु तुहु तिहुअण-सामिय, जं अवहीरहि मई झंखंतं इय पास ! न सोहिय …२३

जुग्गाऽजुग्गविभाग नाह! नहु जोयहितुह समा, भुवणुवयार-सहावभाव करुणारस सत्तमः समविसमइं;

किंघणु नियइभुवि दाह समंतउ?, इय दुहिबंधव ! पासनाह! मइपाल थुणंतउ २४

नय दीणह दीणयु मुयवि अन्नुवि किवि जुग्गय, जं जोइ वि उवयार करहि उवयारसमुज्जय;

दीणह दीणु निहीणु जेण तइ नाहिण चत्तउ तो जुग्गउ अहमेव पास पालहि मई, चंगउ …..२५

अह अन्नुवि जुग्गय-विसेसु किवि, मन्नहि-दीणह, जं पासिवि उवयारु करइ तुहनाह समग्गह;

सुरिचय किल कल्लाणु जेण जिण! तुम्ह पसीयह, किं अन्निण तं चेव देव! या मइ अवहीरह .२६

तुह पत्थण. नहु होइ विहलु जिण जाणउ किंपुण, हउ दुक्खिय निरु सत्तचत्तदुक्खहुँ

उस्सुयमण तं मन्नउ निमिसेण एउ एउवि जइ लब्भ, सच्चं जं भुक्खियवसेण किं उंबरु पच्चइ. २७

तिहुअणसामिअ! पासनाह! मह अप्पु पयासिउ, किज्जउ जं नियरूवसरिसु नमुणउ बहु जंपिउं,

अन्नुन जिणजगि तुहसमोवि दखिन्नु दयासउ जइ अवगन्नसि तुह जिअहह कहहोसु हयासउ २८

जइ तुह रूविण किणवि पेयपाइण-वेलवियउ, तुवि जाणउ. जिणपास तुम्हि हउं अंगकिरिउ,

इयमह इच्छिउ तं न होइ सा तुह ओहावणु रक्खंतह नियकित्ति णेय जुज्जइ अवहीरणु. .२९

एव महारिय ज-त देव एहुन्हवणमहुसउ, जं अणलीअ-गुणगहण तुम्ह मुणिजण अणिसिद्धउ एम पसिह सुपासनाह! थंभणय-पुरट्ठिय!

इय मुणिवरु सिरि-अभयदेउ विन्न वइ अणिंदिय .३०

 

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