No. 54 Sambhav Jinvar Vinanti Jain Stavan संभव जिनवर विनंती…

Sambhav Jinvar Vinanti  संभव जिनवर विनंती…

(राग : यह है पावन भूमि… तारा विना श्याम…../एक पंखी आवीने…. ए मेरे वतन के…)

संभव जिनवर विनंति, अवधारो गुण ज्ञाता रे; 

खामी नहीं मुज खिजमते, कदीये होशो फलदाता रे. ।।१।।

कर जोडी ऊभो रहूं, रात दिवस तुम ध्याने रे; 

जो मनमां आणो नहीं, तो शुं कहीए थाने रे. ।।२।।

खोट खजाने को नहीं, दीजिए वांछित दानो रे; 

करुणा नजर प्रभुजी तणी, वाधे सेवक वानो रे. ।।३।।

काळ लब्धि मुज मति गणो, भाव लब्धि तुम हाथे रे; 

लडथडतुं पण गजबच्चुं, गाजे गयवर साथे रे. ।।४।।

देशो तो तुम ही भला, बीजा तो नवि याचुं रे; 

‘वाचक यश’ कहे सांईशुं, फलशे ए मुज साचुं रे. ।।५।।


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