No.014 Panchashashti Stotra पंचषष्टि स्तोत्र

श्री जयतिलक सूरी महाराज के शिष्य द्वारा यह पंचषष्ठि स्तोत्र (Panchashashti Stotra)की रचना की गई है।श्रद्धा और भक्ति के साथ जो भाग्यशाली इस यंत्र की पूजा करता है उसके घर में भूत प्रेत और पिशाच आदि का कोई भी भय नहीं रहता है। यह एक अत्यंत प्रभावशाली गुप्त मन्त्रों से भरा हुआ पैसठिया यंत्र है

 ।।पंचषष्टि स्तोत्र Panchashashti Stotra।।

आदौ नेमिजिनं नौमि, संभवं सुविधिं तथा; 

धर्मनाथं महादेवं, शान्तिं शान्तिकरं सदा ….. १

अनंतं सुव्रतं भक्त्या, नमिनाथं जिनोत्तमम्, 

अजितं जितकंदर्पं, चंद्रं चंद्रसमं प्रभुम् …….२

आदिनाथं तथा देवं, सुपार्श्वं विमलं जिनम् 

मल्लिनाथं गुणोपेतं, धनुषा पंचविंशतिम् …..३

अरनाथं महावीरं, सुमतिं च जगद्गुरुम्; 

श्री पद्मप्रभनामानं, वासुपूज्यं सुरैर्नतम् …….४

शीतलं शीतलं लोके, श्रेयांसं श्रेयसे सदा; 

श्रीकुंथुनाथं वामेयं, श्रीअभिनंदनं विभुम् …..५

जिनानां नामभिर्लब्धः पंचषष्टिसमुद्भवः, 

यंत्रोऽयं राजते यत्र, तत्र सौख्यं निरंतरम् …… ६

स्मिन् गृहे महाभक्त्या, यंत्रोऽयं पूज्यते बुधैः; 

भूतप्रेत-पिशाचादि-भयस्तत्र न विद्यते ………७

सकलगुणनिधानं यंत्रमेनं विशुद्धं, 

हृदयकमलकोशे, धीमतां ध्येयरूपम्, 

जयतिलकगुरुश्री सूरिराजस्य शिष्यः 

वदति सुखनिदानं, मोक्षलक्ष्मीनिवासम् ……..८

   ।।पंचषष्टि स्तोत्र Panchashashti Stotra।।

 

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