महामंत्रगर्भित श्री कलिकुंड पार्श्वनाथ स्तोत्रम्
Mahamantragarbhita Shri Kalikund Parshwanath Stotra : महामंत्रगर्भित श्री कलिकुंड पार्श्वनाथ स्तोत्रम् इस स्तोत्र का पाठ भक्त यदि नित्य करता है तो वह दीर्घायु,आरोग्य, ऐश्वर्य,एवं इष्ट कामना की सिद्धि प्राप्त करता है। यह अत्यंत प्रभाव विविध बिजाक्षरों से भरपूर स्तोत्र है। इस स्रोत के प्रभाव से भयंकर शत्रुओं के भय,डाकिनी-शाकिनी के उपद्रव,प्रबल विष,भूत-प्रेत-पिशाचों के द्वारा किए जाने वाले महाउपद्रव से प्रभु श्री पार्श्वनाथ रक्षा करते है। यह अत्यंत चमत्कारिक और अकाल मृत्यु को नाश करने वाला ग्रहों को शांत करने वाला विषिष्ठ महामंत्रगर्भित स्तोत्र है।
Mahamantragarbhita Shri Kalikund Parshwanath Stotram
श्रीमद् देवेन्द्रवृन्दामल मुकुटमणि ज्योतिषां चक्रवालै-
र्व्यालीढं पादपीठं शठकमठकृतोपद्रवाऽ बाधितस्य ।
लोकालोकावभासिस्फुरदुरु विमलज्ञानसद्दीप्रदीपः,
प्रध्वस्तध्वान्तजालः स वितरतु सुखं पार्श्वनाथोऽत्र नित्यम्..१
हाँ ह्रीं हैं ह्रौं विभास्वन्मरकतमणभा कांतमूर्ते हि बं मो
हँ सँ तँबीजमन्त्रैः कृतसकल जगत्क्षेम रक्षोरुवक्षाः ।
क्षाँ क्षीं क्ष क्षौं समस्तक्षितितलमहित ! ज्योतिरुद्योतिताशः,
ह्रींकारे रेफयुक्तं र र र र र र रां देव! सं सं संयुक्तं..२
ह्रीं क्लीं ब्लूँ द्राँ समेतं वियदमलकलाक्रौंञ्चकोद्भासि हुँ हूँ।
धुं धुं धुं धुम्रवर्णैरखिलमिहजगन्मे विधेयानुकृष्णं,
वौषड्मन्त्रं पठन्तस्त्रिजगदधिपते ! पार्श्व मां रक्ष नित्यम्. ….३
आँ क्रौं ह्रीं सर्ववश्यं कुरु कुरु सरसं कार्मणं तिष्ठ तिष्ठ,
क्षं क्षं हं रक्ष रक्ष प्रबल बल महाभैरवाराति भीतेः।
द्रां द्रीं द्रूँ द्रावयन्ति द्रव हन हन तं फट् वषट् बन्ध बन्ध,
स्वाहा मंत्रं पठन्तस्त्रिजगदधिपते ! पार्श्व मां रक्ष नित्यम्….. ४
हँ हँ झाँ झाँ क्ष हंसः कुवलय कलितैरंचितांग ! प्रमत्ते
झाँ झाँ हं यक्ष हंसं हर हर हर हूँ पक्षि वः सत्क्षिकोपं
वं झं हं सः सहंसः वस सर सरसं सः सुधाबीजमंत्रै
स्त्रायस्वस्थावरादेः प्रबलविषमुख हारिभिः पार्श्वनाथ: ………..५
क्ष्माँ क्ष्मीँ क्ष्मूँ क्ष्मैँ क्ष्मरेतैरहपति वितनुर्मंत्रबीजैश्च नित्यं
हाहाकारोग्रनादैर्ज्वलदनलशिखाकल्पदीर्घोर्ध्वकेशः ।
पिंगाक्षैर्लोलजिह्वैर्विषमविषधरालंकृतैस्तीक्ष्ण दण्डै-
र्भूतैः प्रेतैः पिशाचैर्धनदकृत महोपद्रवान् रक्ष रक्ष. ……..६
झ्रीँ झ्रौँ झ्रः शाकिनीनां सपदहरसदं भिन्धि शुद्धेद्धबुद्धे-
ग्लौं क्ष्मँ ठँ दिव्य जिह्वा गति मति कुपितः स्तंभनं संविधेहि ।
फट्फट् सर्वाधिरोगग्रहमरणभयोच्चाटनं चैव पार्श्व।
त्रायस्वाशेष दोषादमरनरवरैर्मोतिपादारविन्दः. ……..७
इत्थं मंत्राक्षरोत्थं वचनमनुपमं पार्श्वनाथस्य नित्यं
विद्वेषोच्चाटनं स्तंभन (वन १) जयवशं पापरोगापनोदैः।
प्रोत्सर्पज्जंगमादिस्थविरविषमुखध्वसनं स्थायु दीर्घ-
मारोग्यैश्वर्ययुक्ता भवति पठति यः स्तौति तस्येष्टसिद्धि…..८
Mahamantragarbhita Shri Kalikund Parshwanath Stotram
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